अयोध्या में उद्धव ठाकरे ने सपरिवार किए रामलला के दर्शन








अयोध्या में राम मंदिर को लेकर माहौल गरमा गया है. रविवार को वीएचपी की धर्म सभा से एक दिन पूर्व शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी राम की नगरी पहुंचे और कहा कि वे सरकार को कुंभकर्ण की नींद से जगाने आए हैं और वे राम मंदिर का श्रेय लेने नहीं निर्माण की तारीख जानने आए हैं.

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे रविवार को रामलला का दर्शन किया, जिसके बाद वे प्रेस को संबोधित करेंगे. इससे पहले शनिवार को अपने परिवार के साथ अयोध्या पहुंचे उद्धव ने सरयू तट पर आरती की. उन्होंने साधू संतों और महाराष्ट्र से हजारों की संख्या में आए शिवसैनिकों को संबोधित करते हुए बीजेपी और मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला. उद्धव ठाकरे ने कहा कि वे यहां सिर्फ आशीर्वाद लेने आए हैं, लेकिन अब आते रहेंगे. उन्होंने कहा कि जब वे अयोध्य आ रहे थे, तो लोग उनसे पूछ रहे थे कि क्या राजनीति करने पहुंच रहे हो. मैं यहां राजनीति करने नहीं आया हूं. मैं आज कुंभकर्ण बनी बीजेपी को जगाने आया हूं. कुंभकर्ण तो छह महीने सोता था, लेकिन बीजेपी चार साल से सो रही है. मैं चाहता हूं कि सब मिलकर मंदिर बनाए.

दरअसल, जब 80 के दशक में संघ परिवार और उससे जुड़े संगठन बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर निर्माण का आंदोलन चला रहे थे, तब भी शिवसेना के तत्कालीन बालासाहेब ठाकरे जनता का मू़ड भांपते हुए हिंदुत्व की गाड़ी पर सवार हो गए थे. उन्होंने हिंदुओं के मुद्दे को बीजेपी से ज्यादा आक्रामकता से उठाया. जिसकी वजह से महाराष्ट्र में बीजेपी से ज्यादा शिवसेना को फायदा हुआ और राज्य में शिवसेना बीजेपी का बड़ा भाई बनकर उभरी. उद्धव की दो दिवसीय अयोध्या यात्रा इसी इतिहास को दोहराने जैसी प्रतीत हो रही है.

अब तीन दशक बाद बाल ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे भी वही दोहराते हुए दिख रहे हैं. जब हिंदू दक्षिणपंथी संगठन और संत समाज राम मंदिर को लेकर एक बार फिर आक्रामक हुआ तो उद्धव भी मूड को भांपते हुए वही कर रहे हैं जो उनके पिता ने किया था. हलांकि 2018 की स्थिति 1989 जैसी नहीं है, क्योंकि राम मंदिर का मुद्दा अभी उतना बड़ा और उग्र नहीं हुआ है जितना पहले था. तो सवाल उठना लाजमी है कि शिवसेना ऐसा क्यों कर रही है?

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो हिंदू हार्ड-लाइन एजेंडे से उद्धव को बीजेपी के साथ दोबारा गठबंधन करने का बहाना मिल जाएगा, जबकि वे पिछले चार साल से केंद्र की मोदी सरकार की आलोचना करते आए हैं. दोनो ही दलों के नेता सार्वजनिक तौर पर स्वीकार कर चुके हैं कि कांग्रेस और एनसीपी का मुकाबला करने के लिए शिवसेना-बीजेपी को साथ आना ही पड़ेगा.

उद्धव के अयोध्या दौरे का एक निष्कर्ष यह भी निकाला जा रहा है कि शिवसेना द्वारा हिंदुत्व की लाइन लेने से मुंबई-थाणे-पुणे क्षेत्र के गैर मराठी वोटरों तक पहुंचना आसान होगा. शिवसेना का नेतृत्व यह जानता है कि इस बार मराठी भाषियों का वोट नाकाफी होगा. क्योंकि साल 2014 के चुनावों में बीजेपी ने मुंबई में सेना से ज्यादा सीटें जीती थी. इसलिए यदि शिवसेना को गैर मराठी वोटरों तक पहुंचना है तो उसे विस्तृत एजेंडे पर काम करना होगा. लिहाजा राम मंदिर ही ऐसा मुद्दा है जो उत्तर भारतीयों और गुजराती वोटरों से जुड़ने सेना की मदद करेगा. बता दें कि मुंबई-ठाणे क्षेत्र में महाराष्ट्रियों के बाद उत्तर भारतीय और गुजराती वोटर सबसे ज्यादा हैं.

  

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